Bridging Art, Language and Cultures: A Decade of Hindi Art Journalism by Prabuddha Ghosh (कला, भाषा और संवाद की एक दशक लंबी यात्रा)
कला,
भाषा और संवाद की एक दशक लंबी यात्रा - प्रबुद्ध घोष द्वारा लिखित
हिंदी पत्रकारिता दिवस प्रतिवर्ष ३० मई को मनाया जाता है। इसी दिन १८२६ में पंडित जुगल किशोर
शुक्ल ने भारत का पहला हिंदी समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ प्रकाशित कर हिंदी पत्रकारिता
की आधारशिला रखी थी। यह दिवस उन पत्रकारों के समर्पण और योगदान को सम्मानित करने के
लिए मनाया जाता है, जो निष्पक्ष, स्वतंत्र और जागरूक समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाते हैं। वर्ष २०२६ में हिंदी पत्रकारिता के २०० वर्ष पूर्ण होने पर नई दिल्ली
स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में ‘हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी
महोत्सव’ आयोजित किया जा रहा है। साथ ही देशभर में वेबिनार, संगोष्ठियाँ और पत्रकार
सम्मान समारोह भी होंगे। यह द्विशताब्दी यात्रा भारतीय भाषा, संस्कृति और लोकतांत्रिक
मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति का प्रतीक है।
एक पत्रकार, स्तंभकार और कला लेखक के रूप में मैं उस समय तक एक दशक से अधिक समय से इस क्षेत्र में सक्रिय था। इसलिए यह सलाह मेरे लिए बिल्कुल नई नहीं थी। लेकिन इसकी विशेषता उसका संदर्भ था। हजारों किलोमीटर दूर रहने वाला एक भारतीय, एक विदेशी भाषा के माध्यम से मेरे विचारों से जुड़ रहा था और उन विचारों को एक दूसरे समाज तक पहुँचा रहा था। उस घटना ने मुझे यह महसूस कराया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है; यह संस्कृतियों, समुदायों और विचारों को जोड़ने वाला एक मजबूत सेतु है।
मैंने इस चुनौती को तुरंत स्वीकार कर लिया।
एक विद्यार्थी के रूप में मैंने कभी विद्यालय या महाविद्यालय में हिंदी की औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। हालांकि, भारत के विभिन्न राज्यों और समुदायों के लोगों के साथ व्यावसायिक यात्राओं और कार्य-संबंधी संवादों के कारण मुझे हिंदी बोलने और उसके शब्दों की अच्छी समझ हो गई थी, लेकिन लिखना अभी भी मेरे लिए सहज नहीं था।
मेरे लिए एक बड़ा लाभ यह था कि विद्यालय में दो वर्षों तक संस्कृत पढ़ने के कारण मुझे देवनागरी लिपि का अच्छा ज्ञान था। यही आधार आगे चलकर हिंदी पढ़ने और लिखने में मेरे लिए एक वरदान सिद्ध हुआ।
नई तकनीकों, निरंतर अध्ययन, अनुवाद उपकरणों और भाषा की बारीकियों को समझने के ईमानदार प्रयासों के साथ मैंने एक नई यात्रा शुरू की। इस यात्रा में मेरा साथ देने वाले सभी लोगों के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ। मुझे कुछ ऐसे शिक्षकों का मार्गदर्शन मिला जो आयु में मुझसे काफी छोटे थे, लेकिन उनके सुझाव अत्यंत मूल्यवान थे। विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और आवधिक प्रकाशनों के संपादकों ने भी मुझ पर विश्वास किया और मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया।
मैं विशेष रूप से उन उप-संपादकों और डेस्क संपादकों का ऋणी हूँ जिन्होंने मेरे अक्सर त्रुटिपूर्ण हिंदी लेखन को सुधारने में अपना बहुमूल्य समय और श्रम लगाया। उनका प्रोत्साहन, संशोधन और रचनात्मक आलोचना मेरे लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षण प्रक्रिया बन गई। धीरे-धीरे जो कार्य कभी भाषाई चुनौती लगता था, वही मेरी अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम बन गया और समय के साथ मैंने हिंदी में सहज और प्रवाहपूर्ण लेखन का आत्मविश्वास प्राप्त कर लिया।
जो कार्य एक छोटे से प्रयोग के रूप में शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे एक मिशन में बदल गया। पिछले दस वर्षों में मैंने भारत और विदेशों के कम-से-कम दस विभिन्न हिंदी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेख, समीक्षाएँ, साक्षात्कार और आलोचनात्मक निबंध लिखे हैं। इन प्रकाशनों ने मुझे ऐसे पाठकों से जोड़ा जो कला के प्रति उत्साही थे, लेकिन अपनी भाषा में समकालीन कला विमर्श तक उनकी पहुँच सीमित थी।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि कला पत्रकारिता केवल चुनिंदा वर्गों या सीमित भाषाई समुदायों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। कला समाज की है और समाज अनेक भाषाएँ बोलता है। हिंदी में लिखते हुए मुझे विद्यार्थियों, कलाकारों, शिक्षकों, संग्रहकर्ताओं और सामान्य कला-प्रेमियों का एक व्यापक और विविध पाठक वर्ग मिला।
पिछले पाँच वर्षों में मेरा यह प्रयास राष्ट्रीय सीमाओं से भी आगे बढ़ा है। भारतीय प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक पहलों के साथ-साथ मैंने अंतरराष्ट्रीय कला आयोजनों, विशेष रूप से विभिन्न आर्ट बिएनाले, को हिंदी प्रिंट मीडिया के माध्यम से निरंतर समर्थन दिया है। मेरा उद्देश्य हमेशा एक ही रहा है—भारत और विश्व के बीच सार्थक सांस्कृतिक संवाद स्थापित करना। वैश्विक कला गतिविधियों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाकर मैंने भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं के पार समझ और सराहना के नए पुल बनाने का प्रयास किया है।
यह यात्रा केवल अनुवाद तक सीमित नहीं रही। यह कला तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाने, सांस्कृतिक सहभागिता को बढ़ाने और विभिन्न समाजों के बीच पारस्परिक सम्मान विकसित करने का प्रयास रही है। एक अर्थ में यह भारतीयकरण की प्रक्रिया भी है—किसी संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि वैश्विक कला विमर्श को भारतीय पाठकों के निकट लाने और साथ ही भारतीय दृष्टिकोण को विश्व तक पहुँचाने के उद्देश्य से।
आज जब कला भाषाओं, सीमाओं और विचारधाराओं से परे जाकर संवाद स्थापित कर रही है, तब सांस्कृतिक पत्रकार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शब्दों के माध्यम से हम दस्तावेज़ तैयार करते हैं, व्याख्या करते हैं और लोगों को जोड़ते हैं। मई २०१६ की उस बातचीत को आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि एक साधारण-सा सुझाव एक दशक लंबे संकल्प की नींव बन गया—एक ऐसा संकल्प जो कला, भाषा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विश्वबंधुत्व की स्थायी भावना को समर्पित है।



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